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कार्टूनेचर फ़ीचर सेवा

Friday, August 22, 2014

धर्मान्तरण

यह क्या-क्यों हो रहा है भैया
कश्मीर घाटी में १० साल पहले ५०% हिंदू थे, आज एक भी हिंदू नहीं बचा ! केरल में १० साल पहले तक ६०% जनसंख्या हिन्दुओ की थी, आज सिर्फ १०% हिंदू केरल में है। कहां गये वे हिन्दू ? पूर्वोत्तर यानी नॉर्थ-ईस्ट (सिक्किम, नगालैंड, मिजोरम, असम आदि) में हिन्दुओं का तेजी से धर्मपरिवर्तन होता रहा हैं। हिंदू हर रोज मारे या भगाए जाते रहे हैं। उन्हें सुरक्षा नहीं मिली।
देश की राजधानी में भी मिशनरियां बड़े चालाकी भरे अन्दाज़ में सक्रिय हैं। अब अनेक सालों से धर्मान्तरण करने वाले व्यक्ति का जाति नाम या उपनाम नहीं बदला जाता। जैसे पहले धर्मान्तरण के बाद राम लुभाया चौधरी का नाम राम लुभाया डिसूजा या जॉर्ज वगैरह हो जाता था। अब उसका नाम राम लुभाया चौधरी ही बना रहेगा। 
गम्भीर हालत में अस्पतालों के आईसीयू में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों की स्थिति और भावनाओं का शोषण करते हुए ४-६ मिशनरी के लोग प्रार्थना करते हैं। कुछ ही देर में प्रार्थना में ‘परमेश्वर" शामिल हो जाते हैं। यदि मरीज ठीक हो गया तो ये लोग उसके घर जाकर प्रार्थना करने पर जोर देते हैं। ज्यादातर लोग मान जाते हैं क्योंकि मरीज उनकी प्रार्थना से ही ठीक हुआ है- ऐसा उन्हें बताया जाता है। कई मामलों में धर्मान्तरण कराने में सफ़लता मिल जाती है। तमाम बड़े अस्पतालों में ड्यूटी कर रहे नर्सिंग स्टाफ़, वार्ड ब्वाय और डॉक्टरों में बड़ी संख्या धर्मान्तरित पूर्वोत्तर राज्यों व दक्षिण भारतीयों (केरल, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश आदि) की है। ये और अस्पताल स्टाफ़ के कुछ लोग भी मिशनरियों को पर्याप्त सहयोग देते हैं। ये लोग अपने अभियान की सफ़लता हेतु हिन्दू देवी-देवताओं का नाम शामिल करना भी नहीं भूलते।
यहां लिखे का मैं स्वयं प्रमाण हूं। (चित्र: साभार)

Thursday, August 14, 2014

आज सुबह

हम कब सुधरेंगे 
आज काफ़ी दिनों के बाद निकट के जनकपुरी जिला उद्यान यानी डिस्ट्रिक्ट पार्क (दिल्ली में ही) जाकर डेड़-दो घण्टे बैठने का अवसर मिला। जमकर ऑक्सीजन का सेवन किया। एक सप्ताह पहले तक घर पर मशीन/सिलेण्डर का उपयोग करना पड़ रहा था। यह देखकर कष्ट होता है कि हम खुद को बदल नहीं पाते। या कहें कि ’कौन देखता है!’ सोचकर उचित-अनुचित कुछ भी करते रहते हैं। अब देखिए, पार्क साफ़ सुथरा हो तो अच्छा लगता है। अपने घर में हम ऐसा क्यों नहीं करते? वह हमारा घर है इसीलिए न! यहां थैलियां, गिलास, नाना प्रकार के पाउच आदि कूड़ा-कचरा तो है ही, लोगों ने इसे दारूबाजी का अड्डा भी बना डाला है। एक सेवा (शायद) निवृत सज्जन पास ही खुले आम निवृत हो रहे हैं। यहां कुत्तों द्वारा मस्ती मारना तो मामूली बात है। हम कब सुधरेंगे/बदलेंगे...शायद कभी नहीं...
युवा पीढ़ी का फ़ुटबाल प्रेम

Wednesday, August 13, 2014

कार्टूनिस्ट

कार्टूनिस्ट्स' क्लब ऑफ़ इण्डिया
’कार्टूनिस्ट्स' क्लब ऑफ़ इण्डिया’ कार्टूनिस्टों की संस्था/संगठन का वास्तविक नाम नहीं था। यह किसी कारणवश रखा गया। (क्यों? बाद में बताया जाएगा)
ललित कला महाविद्यालय में प्रवेश मिलने के बाद ही (१९७८) अधिकतम कार्टूनिस्टों को जोड़कर अपने औरउनके के लिए एक मंच स्थापित करने की मेरी अभिलाषा थी। अपनी ओर से मैंने खूब प्रयास किया। हर मौसम में भागता रहा। नतीजा संतोषजनक नहीं निकला पर किसी तरह शुभारम्भ तो हुआ, यही मुझे अच्छा लगा। यह अलग बात है कि मैं लगभग पूरे मामले में चन्दर को अलग-थलग रखने का ही प्रयास जारी रहा। आज भी जारी है...
बाकी फ़िर।
यहां प्रस्तुत है ’कार्टूनिस्ट्स' क्लब ऑफ़ इण्डिया’ का एक पत्र ०९/०७/१९९० और एक पुराने कार्टूनिस्ट का सदस्यता फ़ॉर्म (छाया प्रति)
http://cartoonistchander.blogspot.in/
एक पत्र
सदस्यता फ़ॉर्म

Monday, June 30, 2014

पारले जी

वही पुरानी बात

Thursday, January 23, 2014

आगरा

सभी फ़ोटो: चन्दर
फ़ोटो पर क्लिक करके बड़े आकार में देखें

Sunday, December 29, 2013

पुरस्कार

फ़्रीलांस कार्टूनिस्ट का पुरस्कार चन्दर को
पिछले दिनों महामना मदन मोहन मालवीय जयन्ती के अवसर पर २४ दिसम्बर २०१३ को मेवाड़ इंस्टीट्यूट, वसुन्धरा (गाज़ियाबाद) में वरिष्ठ पत्रकार श्री बनवारी ने कार्टूनिस्ट चन्दर को वर्ष २०१३ का अच्छे स्वतन्त्र व्यंग्यचित्रकार (फ़्रीलांस कार्टूनिस्ट) का पुरस्कार प्रदान किया। कार्टूनिस्ट को प्रशस्ति पत्र, मेवाड़ इंस्टीट्यूट के प्रतीक चिन्ह व शॉल के साथ-साथ एक लिफ़ाफ़ा भी दिया गया।
इस अवसर पर संयोग की बात- मंच पर उपस्थित सर्वश्री बनवारी, राम बहादुर राय, अरविन्द मोहन और जगदीश उपासने सभी उस समय के धांसू अखबार ‘जनसत्ता’ में कार्यरत थे जब मैंने एक साल जनसत्ता में नियमित कार्टूनिस्ट के रूप में कार्य किया। और काक साहब जनसत्ता के पहले कार्टूनिस्ट थे ही, सभी जानते हैं। दूसरा नम्बर अपना था।
• वरुण


Friday, December 27, 2013

मुस्कान

जय मुस्कान!
मेरे कार्टूनिस्ट और कर्टूनप्रेमी मित्रो, मेरा विचार है कि अच्छे कार्टूनों का हिन्दी में एक टेब्लॉइड पीडीएफ़ अखबार निकाला जाए। इस अखबार में कार्टून की अधिकता हो और टाइप की हुई सामग्री न्यूनतम हो यानी आम अखबारों के उलट। यों अभी अखबारों ने कार्टून कला की ओर से मुंह फ़ेर लिया है। कार्टून फ़ोकट की चीज़ बनकर रह गये हैं जो कार्टूनिस्टों के द्वारा इण्टरनेट पर सहज उपलब्ध करा दिये जाते हैं। इस कार्टून प्रधान अखबार को अभी या बाद में अखबारी कागज़ पर छापा जाए- साधन होने पर। अभी इस अखबार को पीडीएफ़ के रूप में देस-विदेश में ई-मेल द्वारा सदस्यों को भेजा जाए। ज़ाहिर है इसके लिए अच्छे कार्टूनों की आवश्यकता होगी ही। रोना वही कि फ़िलहाल मेहनताना नहीं दिया जा सकता। इसके लिए सक्षम होने का प्रयास किया जाएगा, शुरूआत तो हो! सामग्री में विविधता होगी. यह पक्का है। आप लोगों की सहमति हो तो एक अंक बनाया जाए। पर इसके लिए कुछ कार्टूनिस्ट मित्रों के ५ (छपे/बिन छपे) कार्टून/कार्टून स्ट्रिप/कैरीकेचर/फ़ीचर, सचित्र (फ़ोटो सहित) आत्म परिचय वगैरह चाहिए ही चाहिए। कार्यक्रम तय होने पर व्यवस्था हेतु दक्षिणा १०१ (101) या ९९ (99) रुपये रुचि रखने वाले कार्टून प्रेमी यह मामूली सहयोग देंगे तो गाड़ी चल पड़ेगी। इस कार्य में प्रायोजक या विज्ञापन दाता का सहयोग सन्देहात्मक है। वैसे यदि आपके सम्पर्क में कार्टून प्रेमी प्रायोजक या विज्ञापन दाता हैं तो उनको इस पावन कार्य में पुण्य कमाने का न्यौता हैं। उल्लेखनीय है कि मेरा यह प्रयास हम सभी या अधिकतम कार्टूनिस्टों का एक अच्छा मंच बनाने की दिशा में एक कदम है व्यवसाय या धन्धा नहीं। कुछ और जानना-पूछना चाहें तो बिना संकोच सम्पर्क करें- फ़ेसबुक के माध्यम से या cartoonistchander@gmail.com (यहां मेरे हिन्दी पाक्षिक ‘मीडिया नेटवर्क’ के एक पुराने अंक के २ पृष्ठ दिये गये हैं, देखें) लिन्क- http://www.medianetworkweb.blogspot.in/

Wednesday, December 18, 2013

आभार

आपका आभार
सभी मित्रों के प्यार-दुआओं के लिए मैं हृदय से आभारी हूं जिसके परिणाम स्वरूप मैं अब स्वस्थ अनुभव कर रहा हूं!

Wednesday, July 3, 2013

देशभक्ति

बचपनिया देशभक्ति
मेरे जीवन की यह बेवकूफ़ी भरी घटना काफ़ी पुरानी यानी भारत-चीन युद्ध यानी सन १९६२ की है। तब मैं लगभग ८ साल का था। पिताजी तब मध्य प्रदेश के कौलारस में विद्यालय निरीक्षक थे। उनके साथ रेडियो पर युद्ध के समाचारों में युद्ध के लिए धन-सोने और घायल सैनिकों के लिए रक्तदान के बारे में सुनता था। एक दिन मैंने भी जवानों के लिए खून देने का निश्चय कर लिया।
रसोई से निकल की पॉलिश वाला पीतल एक बड़ा गिलास ले लिया और पिताजी के दाढ़ी बनाने के सामान में से एक ब्लेड भी ले लिया। आंगन में एक पेड़ के नीचे बैठकर मैने अपने बायें हाथ की पहली उंगली (तर्ज़नी) पर नाखून से लगभग १/२ इंच ऊपर ब्लेड से एक बड़ा कट मार दिया। अपने बायें हाथ को गिलास में लटका दिया और दायें से गिलास को ढंक लिया ताकि जवानों को दिया जाने वाला खून धूल आदि से दूषित न हो जाए।
तभी मेरी माताजी ने आकर देख लिया। वे घबरा गयीं। संयोग से पिताजी घर पर ही थे। वे भी आ गये।
उन्होंने खून बहना बन्द करने के लिए तुरन्त मेरा हाथ ऊंचा किया और पट्टे बांधी। बाद में उन्होंने समझाया कि जवानों के लिए रक्तदान कैसे किया जाता है। तुम्हारे जैसे बच्चों का खून नहीं लिया जाता। ऐसी बेवकूफ़ी अब कभी मत करना।
अनेक बार मेरी इस बेवकूफ़ी की चर्चा हमारे यहां हुई। अब भी मेरी उंगली पर कटे का हलका निशान मौजूद है- बचपन की देशभक्ति के चिन्ह के रूप में!
• कार्टूनिस्ट चन्दर


Saturday, June 1, 2013

Hospital to home

1. Drawing cartoon from ventilator bed-I
Cartoonist TC Chander drawing cartoon from his ventilator bed, while he was admitted at Sant Paramanand Hospital, Civil Lines in Delhi. 
(19th May, 2013, 04 47 46 pm)
2. Drawing cartoon from ventilator bed-II
Cartoonist T C Chander drawing cartoon from his ventilator bed, while he was admitted at Sant Paramanand Hospital in Delhi.
(19th May, 2013, 04 50 32 pm)

Hospital to home 
May 17-24, 2013

Sunday, September 30, 2012

फ़ोटो कार्टून

ऐसे बनते हैं फ़ोटो कार्टून
आइए, देखिए फ़ोटो कार्टून जो मैंने सम्वाद/बिना सम्वाद के अपने हिन्दी पाक्षिक ‘मीडिया नेटवर्क’ के लिए बनाए थे।
एक पाठक द्वारा फ़ोटो कार्टून के बारे में पूछे जाने पर इसको लेकर तब सम्वाददाता उमा शंकर ने मुझसे बातचीत करके लिखा था- ऐसे बनते हैं फ़ोटो कार्टून। (मीडिया नेटवर्क, १५, नवम्बर, १९९२)

Friday, September 14, 2012

चौधराहट

प्रिय कार्टूनिस्ट बन्धु
विस्वास है स्वस्थ-प्रसन्न होंगे।
क्या आपने मान्य इरफ़ान खान को असीम त्रिवेदी के कार्टूनों को लेकर निंदा करने के लिए अधिकृत किया है? स्वयं देखें, असीम के बहाने कार्टूनिस्टों का स्वयंभू प्रतिनिधि/मुखिया बनने का प्रयास किया जा रहा है।
-चन्दर
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असीम के बहाने चौधराहट
हाल ही में कार्टूनिस्ट असीम के कार्टूनों को लेकर दिल्ली के एक अखबार में इरफ़ान खान का एक लेख छपा है जिसमें उन्होंने लिखा है-
(१) मैं कार्टूनिस्ट बिरादरी की तरफ़ से इसकी निंदा करता हूं। (२) हम पूरी कार्टूनिस्ट बिरादरी इसकी निंदा करते हैं।
(चित्र देखें)
भैया, क्या आपको तमाम कार्टूनिस्टों ने अपना चौधरी नियुक्त कर दिया है? आप कार्टूनिस्टों के धर्मगुरु या मुखिया नहीं हैं। किसी विषय पर आप व्यक्तिगत राय देने के लिए स्वतन्त्र हैं। आपको लिखने और किसी भी अखबार-पत्रिका-वेबसाइट को छापने की पूरी आज़ादी है पर सभी कार्टूनिस्टों के ठेकेदार मत बनिए। यह जरूरी नहीं कि आपके विचारों से सभी कार्टूनिस्ट सहमत हों या आप जैसा कार्टूनिस्ट अन्य के विचारों से सहमत हो। क्या आपको सभी कार्टूनिस्टों ने अपनी ओर से निंदा करने को अधिकृत कर दिया है? अच्छा यही है कि आप अपने तक ही सीमित रहें।

Thursday, September 6, 2012

पाइप

पाइप को माला 
भारत के माननीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन में ‘कार्टूनपन्ना’ कार्टूनिस्ट चन्दर ने उनका एक  कैरीकेचर भैंट किया। इस कैरीकेचर में पार्श्व में लटकी पाइप की पेण्टिंग को माला पहना दी गयी है। उल्लेखनीय है कि श्री प्रणब मुखर्जी लम्बे समय तक पाइप पीते रहे हैं। उनको लेकर बनाये गये लगभग हर कार्टून में उनके हाथ या मुंह में पाइप दिखाया जाना उनकी विशिष्ट पहचान में शामिल हो गया था। इस कार्टून को देखकर वे मुस्कराये बिना नहीं रह सके और हंसते हुए मुझसे बोले- आपने तो हमारे पाइप को ही माला पहना दिया!
राष्ट्रपति भवन में जाकर उनसे मिलना और यह कार्टून भैंट करना मुझे बहुत अच्छा लगा।
हाल ही में (शनिवार, १ सितम्बर, २०१२ को) राजधानी के कुछ कार्टूनिस्ट उनसे जानेमाने कार्टूनिस्ट (स्वर्गीय) कुट्टी की पहली पुण्य तिथि के अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में उन्हें आमन्त्रित करने हेतु भैंट करने गये थे। उन्हें लगभग सभी कार्टूनिस्टों ने चित्र भैंट किए।
और जानकारी के लिए लिन्क देखें- कार्टून न्यूज़ हिन्दी
मुझ से फ़ेसबुक पर मिलें

Wednesday, September 5, 2012

नमन

आज शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षकों को नमन 
स्वर्गीय वीर सिंह (पूर्व प्राचार्य)
मैं आज अन्य शिक्षकों के अलावा अपने शिक्षक पिता स्वर्गीय वीर सिंह जो मध्य प्रदेश के धमधा, जिला दुर्ग (अब छत्तीसगढ़ में) से प्राचार्य पद से सेवा निवृत हुए, को भी सादर नमन करता हूं। वे मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के बिजरौनी और बामौर कलां में माध्यमिक विद्यालयों में प्रधान अध्यापक और कौलारस, नरवर तथा रन्नौद में सहायक विद्यालय निरीक्षक के रूप में कार्य करने के बाद होशंगाबाद के सेमरी हरचन्द और फ़िर दुर्ग के धमधा में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (कन्या) के प्राचार्य रहे। बिजरौनी और बामौर कलां में उन्होंने विद्यालय के अलावा छात्रों को अलग से बिना कोई ट्यूशन फ़ीस लिए बिना किसी भेदभाव के जमकर पढ़ाया जिसके अच्छे परिणाम भी सामने आये। छात्रों पर छाए अंग्रेजी के भय को दूर करने के लिए उन्होंने अंग्रेजी सीखने को लेकर एक पतली सी पुस्तक भी १९५४ में लिखी थी। विद्यालय निरीक्षक रहते हुए इकहरे शरीर के इस स्वामी ने अन्य कई जिम्मेदारियां निभाते हुए साइकल द्वारा लगभग रोजाना ५०-६० किलोमीटर अपने सहायक के साथ दूर-दराज के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर यात्राएं कीं। बिना कोई पूर्व सूचना दिए विद्यालयों का खूब निरीक्षण किया जिसके कारण कई कामचोर और दबंग अध्यापकों की धमकियां भी उन्हें मिलीं पर वे इससे वे डरे नहीं और प्रेम से लोगों को समझा-बुझाकर अपना कर्त्तव्य निभाते रहे। वे व्यवस्था में सुधार के लिए लगातार लगे रहे। उनके एक पूर्व छात्र ने मुझे बताया कि उसके परिवार की बहुत खराब आर्थिक स्थिति के चलते ‘गुरूजी’ ने बहुत मदद की- उच्च शिक्षा दिलाने तक। वे ऐसी बातों की किसी से जरा भी चर्चा नहीं करते थे। अपने वेतन में से वे ऐसे कार्यों में सामर्थ्य से अधिक खर्च करते रहते थे। वे पूरा जीवन मेहनती, ईमानदार और परोपकारी रहे। उनकी पढ़ाने के अलावा स्वयं पढ़ने में भी बहुत रुचि थी। धर्म, योग, भूगोल आदि पर पढ़ना उन्हें प्रिय था। गीता प्रेस गोरखपुर व अन्य प्रकाशनों से भी डाक द्वारा वे नियमित रूप से कल्याण पत्रिका और काफ़ी पुस्तकें मंगाते रहते थे। परिवार की खराब आर्थिक स्थिति के चलते हाई स्कूल के बाद वे आगरा के एसएन हॉस्पीटल में १०-१२ घण्टे ड्यूटी करने के बाद ढिबरी या कैरोसिन लेम्प की रोशनी में पढ़ाई कर स्नातक हुए। बाद में एलटी व साहित्य रत्न भी किया। एमए (भूगोल) काफ़ी बाद में विद्यालय निरीक्षक रहते हुए किया। उनका परिवार मथुरा जिले के एक गांव का काफ़ी समर्थ-समृद्ध और बड़ा परिवार था जो पांच बार डकैतियां पड़ने के बाद परेशान हो अपनी जमीन-जायदाद यूंही छोड़कर आगरा और मथुरा में बस गया। मैं विज्ञान विषय लेकर पढ़ रहा था पर मेरी रुचि कला में थी सो परीक्षा में उत्तीर्ण होना दूर की कौड़ी रहा। खींचखांचकर हायर सेकंडरी किया। इस बीच कभी उन्होंने पेन-पेन्सिल तो दूर सरकारी सामान में से एक कागज तक नहीं लेने दिया। एक बार मेरे द्वारा एक कार्बन पेपर चुराकर लेने पर पोल खुलते ही मुझे बहुत डांटा। हां, मेरे चित्र-कार्टून बनाने पर उन्होंने कभी आपत्ति नहीं की और पत्र-पत्रिका-पुस्तक, कागज, पेन्सिल, स्याही, क्रोक्विल, ब्रश, रंग आदि दिलाने में कभी कंजूसी नहीं दिखाई। मुझे सदा प्रेरित किया। कौलारस, नरवर, मगरौनी आदि गांवों में दूरदूर तक कोई चित्रकार या कला शिक्षक नहीं था सो मुझे कोई मार्गदर्शन नहीं मिल सका। जो किया, खुद किया। अपने आदर्श शिक्षक पिता का में सदा ऋणी रहूंगा। उन्हें पुन: सादर नमन!
• टी.सी. चन्दर
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Sunday, September 2, 2012

कार्टूनिस्ट

राष्ट्रपति से मिले राजधानी के कार्टूनिस्ट
राजधानी के कार्टूनिस्टों के एक प्रतिनिधिमंडल ने केरल कार्टून अकादमी के कार्यक्रम समन्वयक के नेत्रत्व में  भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी से राष्ट्रभवन में आज (०१/०९/२०१२) भैंट की। अधिकांश कार्टूनिस्टों ने राष्ट्रपति को अपने द्वारा बनाये कैरीकेचर-कार्टून भैंट किये। अपने ऊपर बने तरह-तरह कार्टून-कैरीकेचर देखकार कई बार उनके चेहरे पर अनायास ही मुस्कान आ गयी।
केरल कार्टून अकादमी ने स्वर्गीय कार्टूनिस्ट की पहली पुण्यतिथि (२२ अक्टूबर, २०१२) के अवसर पर उनके स्मरण का कार्यक्रम बनाया है जिसके अक्टूबर, 2012 के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में आयोजित होने की आशा है।  इस कार्यक्रम में आने के लिए उन्हें आमन्त्रित किया गया। कार्टूनिस्ट कुट्टी को लेकर आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में शामिल होने के वे इच्छुक हैं।
मलयालम भाषी केपीएस कुट्टी केरल निवासी थे और उनके कार्टून बंग्ला अखबार में छपते थे। उन्हें बंला भाषा नहीं आती थी और अखबार मालिक मलयाम नहीं जानते थे। आपको याद होगा आनन्द बाज़ार पत्रिका समूह की चर्चित साप्ताहिक हिदी पत्रिका `रविवार' के अन्तिम पृष्ठ पर ‘कुट्टी का कार्टून’ छपता था जिसे तमाम पाठक सबसे पहले देखा करते थे। उन्होंने लगभग सात दशक जो कार्टून बनाए उनमें से कई कार्टूनों के पात्र वर्तमान राष्ट्रपति भी बने। ९० साल की आयु में अमरीका में उनका गत वर्ष निधन हो गया था।
केरल कार्टून अकादमी के पूर्व सचिव और अभी कार्यक्रम समन्वयक कार्टूनिस्ट सुधीर नाथ के नेतृत्व में राष्ट्रपति से मिलने गये कार्टूनिस्टों के इस प्रतिनिधि मण्डल में वरिष्ठ कार्टूनिस्ट काक (प्रभासाक्षी), जयन्तो बनर्जी (हिन्दुस्तान टाइम्स), श्यामल बनर्जी (मिण्ट), चन्दर (कार्टूनपन्ना), जगजीत राणा (दै. जागरण), रोहनीत फ़ोर (इण्डियन एक्सप्रेस), सजीत कुमार (डेक्कन क्रॉनीकल), प्रसान्थ (भारतीय वर्तमान), शिजू जॉर्ज (स्वतन्त्र), मनोज कुरील (स्वतन्त्र) और सत्य गोविन्द (स्वतन्त्र) शामिल थे।
देखें- केरल कार्टून अकादमी   केरल कार्टून अकादमी   कार्टूनपन्ना  



Monday, April 23, 2012

आगरावाला

आगरा से प्रकाशित पुस्तिका INDIA का ताज AGRA में कार्टूनिस्ट चन्दर यानी मेरा उल्लेख



Sunday, October 23, 2011

शुभ दिवाली

दीपावली मंगलमय हो!

Saturday, June 18, 2011

ओ.पी. शर्मा

ललित कला महाविद्यालय, नयी दिल्ली के तत्कालीन प्राचार्य- ओ.पी. शर्मा (१९८३)
ललित कला महाविद्यालय, नयी दिल्ली के तत्कालीन प्राचार्य- ओ.पी. शर्मा (१९८३)

Friday, May 27, 2011

Fish And Starfish/Book


FISH AND STARFISH- Short Stories by Mahima (USA) and Illustrated by Cartoonist Chander (India)
16 pages book

कार्टूनेचर फ़ीचर सेवा

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