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कार्टूनेचर फ़ीचर सेवा

Wednesday, August 13, 2014

कार्टूनिस्ट

कार्टूनिस्ट्स' क्लब ऑफ़ इण्डिया
’कार्टूनिस्ट्स' क्लब ऑफ़ इण्डिया’ कार्टूनिस्टों की संस्था/संगठन का वास्तविक नाम नहीं था। यह किसी कारणवश रखा गया। (क्यों? बाद में बताया जाएगा)
ललित कला महाविद्यालय में प्रवेश मिलने के बाद ही (१९७८) अधिकतम कार्टूनिस्टों को जोड़कर अपने औरउनके के लिए एक मंच स्थापित करने की मेरी अभिलाषा थी। अपनी ओर से मैंने खूब प्रयास किया। हर मौसम में भागता रहा। नतीजा संतोषजनक नहीं निकला पर किसी तरह शुभारम्भ तो हुआ, यही मुझे अच्छा लगा। यह अलग बात है कि मैं लगभग पूरे मामले में चन्दर को अलग-थलग रखने का ही प्रयास जारी रहा। आज भी जारी है...
बाकी फ़िर।
यहां प्रस्तुत है ’कार्टूनिस्ट्स' क्लब ऑफ़ इण्डिया’ का एक पत्र ०९/०७/१९९० और एक पुराने कार्टूनिस्ट का सदस्यता फ़ॉर्म (छाया प्रति)
http://cartoonistchander.blogspot.in/
एक पत्र
सदस्यता फ़ॉर्म

Monday, June 30, 2014

पारले जी

वही पुरानी बात

Thursday, January 23, 2014

आगरा

सभी फ़ोटो: चन्दर
फ़ोटो पर क्लिक करके बड़े आकार में देखें

Sunday, December 29, 2013

पुरस्कार

फ़्रीलांस कार्टूनिस्ट का पुरस्कार चन्दर को
पिछले दिनों महामना मदन मोहन मालवीय जयन्ती के अवसर पर २४ दिसम्बर २०१३ को मेवाड़ इंस्टीट्यूट, वसुन्धरा (गाज़ियाबाद) में वरिष्ठ पत्रकार श्री बनवारी ने कार्टूनिस्ट चन्दर को वर्ष २०१३ का अच्छे स्वतन्त्र व्यंग्यचित्रकार (फ़्रीलांस कार्टूनिस्ट) का पुरस्कार प्रदान किया। कार्टूनिस्ट को प्रशस्ति पत्र, मेवाड़ इंस्टीट्यूट के प्रतीक चिन्ह व शॉल के साथ-साथ एक लिफ़ाफ़ा भी दिया गया।
इस अवसर पर संयोग की बात- मंच पर उपस्थित सर्वश्री बनवारी, राम बहादुर राय, अरविन्द मोहन और जगदीश उपासने सभी उस समय के धांसू अखबार ‘जनसत्ता’ में कार्यरत थे जब मैंने एक साल जनसत्ता में नियमित कार्टूनिस्ट के रूप में कार्य किया। और काक साहब जनसत्ता के पहले कार्टूनिस्ट थे ही, सभी जानते हैं। दूसरा नम्बर अपना था।
• वरुण


Friday, December 27, 2013

मुस्कान

जय मुस्कान!
मेरे कार्टूनिस्ट और कर्टूनप्रेमी मित्रो, मेरा विचार है कि अच्छे कार्टूनों का हिन्दी में एक टेब्लॉइड पीडीएफ़ अखबार निकाला जाए। इस अखबार में कार्टून की अधिकता हो और टाइप की हुई सामग्री न्यूनतम हो यानी आम अखबारों के उलट। यों अभी अखबारों ने कार्टून कला की ओर से मुंह फ़ेर लिया है। कार्टून फ़ोकट की चीज़ बनकर रह गये हैं जो कार्टूनिस्टों के द्वारा इण्टरनेट पर सहज उपलब्ध करा दिये जाते हैं। इस कार्टून प्रधान अखबार को अभी या बाद में अखबारी कागज़ पर छापा जाए- साधन होने पर। अभी इस अखबार को पीडीएफ़ के रूप में देस-विदेश में ई-मेल द्वारा सदस्यों को भेजा जाए। ज़ाहिर है इसके लिए अच्छे कार्टूनों की आवश्यकता होगी ही। रोना वही कि फ़िलहाल मेहनताना नहीं दिया जा सकता। इसके लिए सक्षम होने का प्रयास किया जाएगा, शुरूआत तो हो! सामग्री में विविधता होगी. यह पक्का है। आप लोगों की सहमति हो तो एक अंक बनाया जाए। पर इसके लिए कुछ कार्टूनिस्ट मित्रों के ५ (छपे/बिन छपे) कार्टून/कार्टून स्ट्रिप/कैरीकेचर/फ़ीचर, सचित्र (फ़ोटो सहित) आत्म परिचय वगैरह चाहिए ही चाहिए। कार्यक्रम तय होने पर व्यवस्था हेतु दक्षिणा १०१ (101) या ९९ (99) रुपये रुचि रखने वाले कार्टून प्रेमी यह मामूली सहयोग देंगे तो गाड़ी चल पड़ेगी। इस कार्य में प्रायोजक या विज्ञापन दाता का सहयोग सन्देहात्मक है। वैसे यदि आपके सम्पर्क में कार्टून प्रेमी प्रायोजक या विज्ञापन दाता हैं तो उनको इस पावन कार्य में पुण्य कमाने का न्यौता हैं। उल्लेखनीय है कि मेरा यह प्रयास हम सभी या अधिकतम कार्टूनिस्टों का एक अच्छा मंच बनाने की दिशा में एक कदम है व्यवसाय या धन्धा नहीं। कुछ और जानना-पूछना चाहें तो बिना संकोच सम्पर्क करें- फ़ेसबुक के माध्यम से या cartoonistchander@gmail.com (यहां मेरे हिन्दी पाक्षिक ‘मीडिया नेटवर्क’ के एक पुराने अंक के २ पृष्ठ दिये गये हैं, देखें) लिन्क- http://www.medianetworkweb.blogspot.in/

Wednesday, December 18, 2013

आभार

आपका आभार
सभी मित्रों के प्यार-दुआओं के लिए मैं हृदय से आभारी हूं जिसके परिणाम स्वरूप मैं अब स्वस्थ अनुभव कर रहा हूं!

Wednesday, July 3, 2013

देशभक्ति

बचपनिया देशभक्ति
मेरे जीवन की यह बेवकूफ़ी भरी घटना काफ़ी पुरानी यानी भारत-चीन युद्ध यानी सन १९६२ की है। तब मैं लगभग ८ साल का था। पिताजी तब मध्य प्रदेश के कौलारस में विद्यालय निरीक्षक थे। उनके साथ रेडियो पर युद्ध के समाचारों में युद्ध के लिए धन-सोने और घायल सैनिकों के लिए रक्तदान के बारे में सुनता था। एक दिन मैंने भी जवानों के लिए खून देने का निश्चय कर लिया।
रसोई से निकल की पॉलिश वाला पीतल एक बड़ा गिलास ले लिया और पिताजी के दाढ़ी बनाने के सामान में से एक ब्लेड भी ले लिया। आंगन में एक पेड़ के नीचे बैठकर मैने अपने बायें हाथ की पहली उंगली (तर्ज़नी) पर नाखून से लगभग १/२ इंच ऊपर ब्लेड से एक बड़ा कट मार दिया। अपने बायें हाथ को गिलास में लटका दिया और दायें से गिलास को ढंक लिया ताकि जवानों को दिया जाने वाला खून धूल आदि से दूषित न हो जाए।
तभी मेरी माताजी ने आकर देख लिया। वे घबरा गयीं। संयोग से पिताजी घर पर ही थे। वे भी आ गये।
उन्होंने खून बहना बन्द करने के लिए तुरन्त मेरा हाथ ऊंचा किया और पट्टे बांधी। बाद में उन्होंने समझाया कि जवानों के लिए रक्तदान कैसे किया जाता है। तुम्हारे जैसे बच्चों का खून नहीं लिया जाता। ऐसी बेवकूफ़ी अब कभी मत करना।
अनेक बार मेरी इस बेवकूफ़ी की चर्चा हमारे यहां हुई। अब भी मेरी उंगली पर कटे का हलका निशान मौजूद है- बचपन की देशभक्ति के चिन्ह के रूप में!
• कार्टूनिस्ट चन्दर


Saturday, June 1, 2013

Hospital to home

1. Drawing cartoon from ventilator bed-I
Cartoonist TC Chander drawing cartoon from his ventilator bed, while he was admitted at Sant Paramanand Hospital, Civil Lines in Delhi. 
(19th May, 2013, 04 47 46 pm)
2. Drawing cartoon from ventilator bed-II
Cartoonist T C Chander drawing cartoon from his ventilator bed, while he was admitted at Sant Paramanand Hospital in Delhi.
(19th May, 2013, 04 50 32 pm)

Hospital to home 
May 17-24, 2013

Sunday, September 30, 2012

फ़ोटो कार्टून

ऐसे बनते हैं फ़ोटो कार्टून
आइए, देखिए फ़ोटो कार्टून जो मैंने सम्वाद/बिना सम्वाद के अपने हिन्दी पाक्षिक ‘मीडिया नेटवर्क’ के लिए बनाए थे।
एक पाठक द्वारा फ़ोटो कार्टून के बारे में पूछे जाने पर इसको लेकर तब सम्वाददाता उमा शंकर ने मुझसे बातचीत करके लिखा था- ऐसे बनते हैं फ़ोटो कार्टून। (मीडिया नेटवर्क, १५, नवम्बर, १९९२)

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